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श्री प्रेमकुमार शर्मा जी — साहित्यकार, पत्रकार और अध्यात्म-शोधक, जिन्होंने भारतीय अध्यात्म में छिपे विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया।
बचपन अपने पिता के साथ कलकत्ता में बीता। इसके पश्चात स्कूली शिक्षा पैतृक गाँव कमतौल से पूरी की। मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद ही दो उपन्यास लिखे, जिनका प्रकाशन बनारस के 'चिंगारी प्रकाशन' द्वारा किया गया।
इसके बाद दरभंगा के मारवाड़ी कॉलेज से स्नातक और स्नातकोत्तर (M.A.) की शिक्षा प्राप्त की।
सन् 1978 से 1995 तक अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। विभिन्न समाचार पत्रों के लिए लेख एवं कहानियाँ लिखते रहे। धीरे-धीरे उनका रुझान अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा।
उन्होंने भारतीय अध्यात्म में छिपे हुए विज्ञान को लोगों के सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया और 100 से अधिक पुस्तकों की रचना की।
उनका अंतिम समय मध्य प्रदेश के सागर शहर में बीता। सन् 2021 में उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी अमूल्य रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमर धरोहर हैं।
उनकी पाँच महत्त्वपूर्ण पुस्तकें जो Amazon और Flipkart पर उपलब्ध हैं।
"न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।"
— श्रीमद्भगवद्गीता ४.३८ · इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं