मनुष्य जन्म लेने के बाद एक क्षण के लिए भी अपने अस्तित्व के कारण के बारे में नहीं सोचता। इस संसार को देखकर वह इतना विस्मित हो जाता है कि उसे भोगने में ही लग जाता है और स्वयं को ही सब कुछ समझने लगता है। वह यह भूल जाता है कि वह इस संसार में पहले नहीं था, पर अब है। क्यों है? कौन है? और कहाँ से आया है? — ये प्रश्न उसके लिए अनावश्यक हो जाते हैं।
जन्म लेने के बाद जीव जिस संसार को देखता है, उसके कारण पर भी वह विचार नहीं करना चाहता। वह यह जानने की चेष्टा नहीं करता कि यह रहस्यमय ब्रह्माण्ड क्या है और इसमें उसकी क्या स्थिति है। वह यह भी नहीं सोचना चाहता कि मृत्यु क्या है और मरने के बाद क्या होता है।
यही मनुष्य जीवन की सबसे विचित्र स्थिति है।
आश्चर्यजनक स्थिति
मनुष्य स्वयं को प्रकृति का सबसे विकसित और बुद्धिमान प्राणी कहता है। उसका दावा है कि वह पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है। परन्तु यह भी सत्य है कि वह अपने जीवन से जुड़े सबसे मूलभूत प्रश्नों पर विचार ही नहीं करता।
वह स्वयं को सब कुछ समझने वाला मानता है और जीवनभर अपने ‘मैं’ को संतुष्ट करने में लगा रहता है। अन्ततः एक दिन वह शक्तिहीन होकर इस संसार से चला जाता है। तब उसका यह अहंकार उसके किसी काम नहीं आता।
भारतीय ऋषियों ने मनुष्य की इस स्थिति पर आश्चर्य प्रकट किया है। उन्होंने कहा है कि जीव जन्म लेने के बाद संसार के आकर्षण में इतना उलझ जाता है कि अपने अस्तित्व के मूल कारणों पर विचार करना ही भूल जाता है।
भोगों के नशे में बीतता जीवन
जब एक बच्चा जन्म लेता है तो वह जिस आकर्षक संसार को देखता है, उसके विषय में सोचने की उसे फुर्सत ही नहीं होती। धीरे-धीरे वह इच्छाओं और कामनाओं की दुनिया में प्रवेश कर जाता है।
प्रारम्भ में उसकी कामनाएँ केवल दूध और माता तक सीमित रहती हैं। फिर खिलौनों और भोजन की वस्तुओं तक फैल जाती हैं। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी इच्छाएँ और कामनाएँ भी बढ़ती जाती हैं।
मनुष्य का पूरा जीवन इन इच्छाओं और भोगों की पूर्ति के संघर्ष में ही व्यतीत हो जाता है। वह कभी यह विचार नहीं करता कि वह कौन है, कहाँ से आया है और जिस जगत में उसने जन्म लिया है उसका वास्तविक स्वरूप क्या है।
यदि कभी ऐसे प्रश्न उसके मन में उठते भी हैं, तो वह उन्हें निरर्थक समझकर टाल देता है। उसे लगता है कि इन प्रश्नों से उसे अपनी इच्छाओं की पूर्ति में कोई सहायता नहीं मिलेगी।
इस प्रकार जीव जन्म लेते ही एक प्रकार के नशे का शिकार हो जाता है। इच्छाओं और भोगों का यह नशा उससे कभी नहीं उतरता। जीवन भर वह इसी में उलझा रहता है और अन्ततः उसी अवस्था में उसका जीवन समाप्त हो जाता है।
अज्ञानता भय को जन्म देती है
मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन अपने अस्तित्व के अहंकार और संसार के भोगों की प्राप्ति के संघर्ष में बीत जाता है। परन्तु जब वह वृद्ध होता है और मृत्यु निकट दिखाई देने लगती है, तब उसके मन में भय उत्पन्न होता है।
यह भय इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि वह नहीं जानता कि मृत्यु के बाद क्या होगा। उसे यह भी ज्ञात नहीं होता कि मृत्यु के बाद उसे किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ेगा।
उसके मन में अनेक प्रश्न उठते हैं—
क्या मृत्यु के बाद भी कोई अनुभूति रहती है?
क्या उसे स्वर्ग मिलेगा या नरक?
इन प्रश्नों का उत्तर न जान पाने के कारण ही मनुष्य के मन में भय उत्पन्न होता है।
मोह का जाल: नारद और राजा की कथा
पुराणों में एक कथा आती है।
एक बार नारदजी एक राजा के दरबार में पहुँचे। राजा बहुत दुखी थे क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी और उन्हें यह चिंता थी कि उनके राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा।
नारदजी ने उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। परन्तु उन्होंने यह भी कहा कि जब पुत्र जन्म ले ले, तब राजा राज्य का भार उसे सौंपकर परमात्मा के भजन में लग जाएँ।
कुछ समय बाद राजा को पुत्र प्राप्त हुआ। जब पुत्र थोड़ा बड़ा हुआ, तब नारदजी राजा को उनका वचन याद दिलाने आए। राजा ने कहा— “अभी तो मैंने पुत्र का मुख भी ठीक से नहीं देखा है। उसे गुरुकुल भेजने दीजिए, फिर मैं चलूँगा।”
नारदजी लौट गए।
कुछ वर्षों बाद वे फिर आए, जब राजकुमार गुरुकुल से लौट आया था। राजा ने कहा— “राज्य को सुरक्षित हाथों में सौंपना भी तो आवश्यक है। पहले इसका राज्याभिषेक हो जाने दीजिए, फिर मैं चलूँगा।”
नारदजी फिर लौट गए।
जब राजकुमार का विवाह हो गया, तब नारदजी फिर आए। राजा ने कहा— “पहले मैं अपने पोते का मुख देख लूँ, फिर अवश्य चलूँगा।”
इस प्रकार राजा हर बार किसी न किसी मोह के कारण अपना वचन टालते रहे।
यह कथा मनुष्य के जीवन का प्रतीक है। मनुष्य हमेशा कहता रहता है— “बस थोड़ा समय और।”
परन्तु यह “थोड़ा समय” कभी समाप्त नहीं होता।
मनुष्य का दोहरा व्यक्तित्व
मनुष्य अपने बाहरी व्यक्तित्व में स्वयं को ईमानदार, न्यायप्रिय और महान दिखाने का प्रयास करता है। वह चाहता है कि समाज उसे आदर्श व्यक्ति माने।
किन्तु उसके व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी होता है— छिपा हुआ आन्तरिक व्यक्तित्व। इसमें झूठ, ईर्ष्या, क्रोध, कपट और स्वार्थ जैसे अनेक भाव भरे रहते हैं।
कई लोग दूसरों की निन्दा करते हुए और स्वयं की प्रशंसा करते हुए अपने व्यक्तित्व को महान सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। वे अपने पक्ष में आने वाले तथ्यों को प्रकाशित करते हैं और विरोध में जाने वाले तथ्यों को छिपा लेते हैं।
ऐसे लोग लंबे समय तक अपने बनाए हुए भ्रम में ही जीते रहते हैं।
प्रकृति की माया और सत्य की खोज
महर्षि कपिल से लेकर आदि शंकराचार्य तक अनेक महान आत्माओं ने इस स्थिति पर गहरा आश्चर्य प्रकट किया है।
उनका कहना है कि यह प्रकृति की महान माया है, जो जीव को सत्य जानने नहीं देती। उसकी मानसिक शक्तियाँ प्रायः भौतिक स्तर तक ही सीमित रह जाती हैं।
करोड़ों लोगों में से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो जीवन के इस सत्य को जानने का प्रयास करता है। और जो प्रयास करते हैं, उनमें से भी बहुत कम लोग उस सत्य को जान पाते हैं।
जीवन और मृत्यु की वास्तविक खोज इसी सत्य को समझने की एक कड़ी है।
पाठकों की टिप्पणियाँ (1)
great post
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